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सौभाग्य पंचमी व्रत

Published On : October 2, 2022  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

सौभाग्य पंचमी व्रत एवं उसका महत्व

यह व्रत भारतवर्ष की अति पुनीत धरती पर महिलाओं के द्वारा विशेष रूप से अपने सौभाग्य की रक्षा हेतु किया जाता है। ऐसी आकांक्षाओं एवं सद्भावनों के कारण ही जीवन के तमाम कष्टों से छुटकारा प्राप्त होता है। चाहे वह महिलाओं के सुख एवं सौभाग्य की बातें हो या फिर दाम्पत्य के पवित्र वंधनों से जुड़ने की बातें हो सभी अपने आप में बड़ी ही मत्वपूर्ण एवं उपयोगी होती है। यह सौभाग्य पंचमी व्रत जिसका नाम जैसा है वैसा काम भी यानी जीवन में सुख एवं सौभाग्य को बढ़ाने वाला परम पुनीत यह व्रत है। जो व्यक्ति के जीवन में उन्नति देने वाला होता है। यह प्रतिवर्ष बड़े ही हर्षोल्लास के साथ कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों के अनुसार इस पंचमी में विधि विधान से भगवान आदि देव महा देव की पूजा करने से व्यक्ति को जीवन में व्यापारिक सफलता के रास्ते खुलते हैं। इस व्रत की विधान एवं पूजन से मांगलिक वाक्य शुभ लाभ बहुत ही सफल होते हैं। तथा संबंधित क्षेत्रों में लाभ का स्तर और बढ़ जाता है। इस पंचमी को कई नामों से जाना एवं पूजा जाता है। जया पंचमी, ज्ञान पंचमी लेखनी पंचमी या लाभ वाली पंचमी तथा सौभाग्य पंचमी के रूप में जाना एवं पूजा जाता है। अर्थात् कई नामों मे यह प्रसिद्ध पंचमी व्यक्ति को जीवन में वांछित तरक्की देने वाली होती है। जिससे यह मात्र महिलाओं में ही नहीं बल्कि पुरूषों एवं व्यापारियों में भी इस व्रत का प्रचलन है। और इसे स्त्री एवं पुरूष दोनों ही मिलकर करते हैं।

सौभाग्य पंचमी व्रत एवं पूजा विधि

इस व्रत में भगवान श्री गणेश एवं महादेव शिव की पूजा अर्चना विधि विधान के साथ की जाती है। इसे लाभ वाली पंचमी इसलिये कहा जाता है। कि इस व्रत में जो भी साधक भगवान गणपति एवं शिव की पूजा अर्चना करता है। उसे कई तरह के लाभ एवं विजय प्राप्त होती है। तथा इस व्रत में भगवान की पूजा से घरेलू जीवन में बन रहे कष्टों से छुटकारा प्राप्त होता है। तथा कार्य एवं व्यापार में हो रही परेशानियों से छुटकारा प्राप्त होता है। तथा कारोबार में वृद्धि की स्थिति और मजबूत होती है। अतः इस व्रत में विधि पूर्वक पवित्रता का पालन करते हुये समग्र व्रत एवं पूजन की सामाग्री, जल, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, सुगन्धित पुष्प, फल मिष्ठान सिंदूर आदि को एकत्रित करके अपने पूजा स्थल पर रख लें। और आसन में पूर्वाभिमुख एवं उत्तराभिमुख होकर बैठे तथा आत्मशुद्धि एवं पवित्री करण को करते हुये भगवान का स्मरण करें। तथा व्रत एवं पूजा का संकल्प लेते हुये षोड़शोपचार विधि से पूजा अर्चना करें। तथा शिव जी को बिल्व पत्र, धतूर, भांग आदि अर्पित कर उन्हें पुष्पांजलि देते हुये श्री गणेश को अघ्र्य दे और फिर अपनी किसी भी भूल की गणपित आदि देवों की प्रार्थना करें। और अपने पूजा कर्म को भगवान शिव को अर्पित कर दें। यदि कोई कारोबारी जीवन में रूकावट है, तो उसे दूर करने की भी प्रार्थना करें और शुद्ध चित्त से भगवान का स्मरण करते हुये अपने सुख एवं सौभाग्य को बढ़ाने की प्रार्थना भी करें। और फिर इस सौभाग्य दायक पंचमी की व्रत विधि एवं कथा को विस्तार से सुने।

सौभाग्य पंचमी व्रत कथा

इस व्रत के संबंध में पौराणिक संदर्भ प्राप्त होते है। किन्तु कुछ प्रचलित कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में एक निर्धन व्यक्ति था जो कि अपनी निर्धनता से दुःखी होकर इधर-उधर भटक रहा था। तथा रोटी रोजगार हेतु जो भी प्रयास करता उसे सफलता नहीं मिलती थी और वह इससे दुःखी होकर उसने इस गरीबी को दूर करने का उपाय इसके जानकारों से पूछा तो उसे कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी में पड़ने वाले व्रत जिसे सौभाग्य पंचमी कहा जाता है। को करने का उपदेश हुआ। जिससे उत्साहित होकर उसने इस पंचमी तिथि में व्रत को विधि विधान से श्री गणेश एवं शिव तथा लक्ष्मी जी पूजा अर्चना किया और प्रति वर्ष वह जैसे-जैसे अपने आस्था को बढ़ा रहा था वैसे ही उसे श्री गणेश एवं शिव तथा माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त हुई और वह जो भी कारोबार एवं व्यापार करता उसे सफलता मिलती और उसके सुख सौभाग्य की वृद्धि होती है। तथा उसे इस संसार के समस्त सुखों की प्राप्ति हुई। तब से व्यापार के क्षेत्रों में सफल होने की इच्छा रखने वाले लोग इस व्रत का पालन बड़ी ही निष्ठा से करते चले आ रहे हैं।

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