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कार्तिक पूर्णिमा

Published On : August 20, 2023  |  Author : Astrologer Pt Umesh Chandra Pant

कार्तिक पूर्णिमा

हिन्दू धर्म के व्रत पर्वों के सोपान में यह सबसे श्रेष्ठ एवं सुखद सोपान है। इस तिथि को ही देवताओं को चुनौती देने वाले राक्षस समूह का संहार हुआ था। इस पूर्णिमा के दिन से कार्तिम मास का स्नान एवं दानादि के क्रम सम्पन्न हो जाते हैं। इस मास को भगवान विष्णू से जोड़कर देखा जाता है। जिससे इसे माधव मास आदि नामों से भी जानते हैं। इसी दिन श्री हरि विष्णू एवं सत्यनायण सहित शिव पार्वती एवं कार्तिकेय आदि देवताओं की पूजा करने का विधान होता है। जिसके संदर्भ में यह कहा जाता है। कि त्रिपुरासुर नाम के राक्षस ने देव लोक में विजय हासिल करने के उद्देश्य से तीनों लोको में आंतक मचा रखा था। जिससे सभी देवता एवं धरती आदि परेशान थे। तथा भगवान शिव ने भक्तों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर त्रिपुरासुर का वध इसी दिन किया था। जिससे इस कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है। इस पूर्णिमा के दिन भगवान मत्स्यावतार धारण किया था। कार्तिक मास में गंगा आदि तीर्थ एवं पवित्र जल में स्नान का विधान होता है। यदि तीर्थो तक नहीं पहुंच सकते हैं। तो गंगा जला को मिलाकर स्नान कर सकते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा की पूजा विधि

इस कार्तिक पूर्णिमा की पूजा के लिये नियम संयम एवं ब्रह्मचर्य का पालन जरूरी होता है। सूर्योदय से पहले उठकर शोचादि स्नानादि क्रियाओं को पूरा करने के पश्चात् सम्पूर्ण पूजन की सामाग्री को एकत्रित करके पवित्र आसन में बैठे। तथा आचमन आदि करके पूजा का संकल्प लें और भगवान की पूजा प्रसन्न चित्त से श्रद्धा से करे और कथा सुने सुनाये और तथा दीप दानादि करें। या फिर किसी वैदिक कार्य में निपुण ब्रह्मण द्वारा पूजन कार्य को करवायें और कथा श्रवण करें। व्रत का संकल्प लेते हुये भगवान से व्रत पालन की शक्ति हेतु प्रार्थना करें|

कार्तिक पूर्णिमा की कथा

कथा में तारकासुर राक्षस एवं उसके तीन पुत्रों का प्रसंग प्रचलित है। जो देवताओं को पराजित करने तथा सम्पूर्ण लोकों में अपना अधिकार चाहने के लिये अनेको प्रकार के तप किये तथा अपने लक्ष्य यानी देवताओं को परेशान एवं पराजित करने के लिये वह और भी कठोर तप करने लगे। उनके इस कठिन तपस्या को देखकर जहाँ न केवल देवताओं का सिंहासन हिलने लगा बल्कि परम पिता ब्रह्मा को खुद ही उन्हें वरदान देने आना पड़ा। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर पितामह श्री ने कहा आप लोग किस कारण से इनता बड़ा तप कर रहें। मुझसे कहिये। पितामह को समुन्मुख देखकर वह प्रणाम करके बोले कि हे परम पिता ब्रह्मा जी यदि हमें कुछ देना चाहते है तो हमे सदैव अमर होने का वरदान दे दीजिये इस पर ब्रह्म ने कहा कि यह तो सृष्टि का बड़ा ही पक्का नियम है कि संसार में जो पैदा है उसकी मृत्यु का भी विधान है। अतः मै तुम्हें अमर होने का वरदान नहीं दे सकता हूँ। आप लोग इसके अतिरिक्त कोई दूसरा वदरान ले लो, तो उन्होंने कहा हे प्रभु! हमें देवताओं पर विजय का वरदान दें, तथा कहा हमारी मृत्यु साधारण तरीके से नहीं हो, बल्कि जो हम तीनों के नगर को एक साथ बेध सके उसके द्वारा हमारी मृत्यु हो अतः तीन पुरों के स्वामी होने के कारण उस राक्षस का नाम त्रिपुर पड़ा था। जिसे शिव जी ने संहार किया था। क्योंकि राक्षस समूहों का विनाश करना बड़ा ही कठिन काम था। ऐसे में वरदान की मर्यादा और संसार का सुरक्षा को ध्यान में रख करके भगवान शिव ने उस महा भयानक राक्षस का संहार किया था।

कार्तिक पूर्णिमा का महत्व

कार्तिक पूर्णिमा का जहाँ धार्मिक एवं सामाजिक महत्व है। वहीं सेहत की दृष्टि से भी यह बहुत ही महत्वपूर्ण तिथि है। क्योंकि इस पूर्णिमा मे किये गये व्रत एवं पूजन का विशेष महत्व होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी व्रत सेहत के लिये फायदेमंद होता है। इस मास को भगवान विष्णू के नाम केशव मास से भी जाना जाता है। क्योंकि इस महीने एक माह तक सूर्योदय से पहले भक्त साधकों का स्नान चलता रहता है। इस स्नान की शुरूआत शरद से होती है। तथा इस कार्तिक पूर्णिमा के दिन से ही एक माह का चल रहा कार्तिक स्नान पूर्ण हो जाता है। क्योंकि इस कार्तिक माह के स्नान एवं दान के पीछे पुण्योदय होना होता है। इसलिये बड़ी संख्या मे श्रद्धालु सूर्योदय से पहले स्नान करके भगवान का स्मरण एवं भक्ति भाव के साथ पूजन करते हैं। इस पूर्णिमा के अवसर पर कई महत्वपूर्ण एवं नवीन कामों की शुरूआत भी की जाती है। यह पूर्णिमा देवताओं की दीपावली का पर्व भी है। इसी दिन महादेव ने त्रिपुरासुर का बध किया था। जिससे उनके नाम में त्रिपुर संहारक जुड़ गया है। भगवान राम ने शिव को प्रसन्न करने के लिये इसी दिन एक हजार कमलों से उनकी अर्चना की थी। तथा शिव ने उनकी परीक्षा लेने के लिये एक कमल को गायब कर दिया था। जिससे भगवान राम ने अपनी एक आंख ही भगवान शिव को अर्पित कर दी थी। जिससे वह राजीव लोचन कहलाये। इसी दिन भगवान विष्णू मत्स्य अवतार के रूप में प्रकट हुये थे। अतः इस दिन जो भी जप, तप, पूजा एवं पाठ तथा यज्ञ एवं हवन किये जाते हैं। वह कई गुना फलदायक हो जाते हैं। तथा व्यक्ति के जन्म जन्मान्तरों के पापों का समूह नष्ट हो जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा की मान्यतायें

इस पूर्णिमा के विषय में मान्यतायें है कि पांडवों ने अपने मृत आत्माओं के लिये स्नान एवं दान का आयोजन किया था। इसी कारण गंगा के इस तट का नाम गढ़मुक्तेश्वर हुआ। अतः यहाँ आकर स्नान करने तथा पितरों के निमित्त तर्पण करने की मान्यतायें हैं। इस तिथि में यहाँ वृषभ दान की मान्यतायें हैं। यह कार्तिक पूर्णिमा का पर्व शैव एवं वैष्णव दोनों के लिये महत्वपूर्ण है। इस कार्तिक माह में तुलसी एवं आवलें के वृक्ष के पूजन का विशेष महत्व होता है। हालांकि यह ग्रह नक्षत्रों के संयोग से विशेष योग को निर्मित करने वाली होती है। जैसे कृतिका नक्षत्र पर चन्द्र तथा विशाखा पर सूर्य के संचरण करने से पद्मक नामक योग निर्मित होता है। इस योग में तीर्थ एवं गंगा स्थान में पुष्कर के समान फल मिलता है। इस प्रकार कई धार्मिक मान्यतायें इस व्रत यानी कार्तिक पूर्णिमा के संबंध में प्रचलित हैं।

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